21वीं सदी, स्त्री कथाकारों की विकसित होती लंबी श्रृंखला है - संतोष श्रीवास्तव
भोपाल । अंतर्राष्ट्रीय विश्वमैत्री मंच का एक अभिनव आयोजन, कहानी संवाद “दो कहानी- दो समीक्षक” गूगल मीट पर आयोजित किया गया।
इस अवसर अध्यक्षता कर रही अंतर्राष्ट्रीय विश्वमैत्री मंच की संस्थापक अध्यक्ष संतोष श्रीवास्तव ने कहानी संवाद में पढ़ी गई दोनों कहानियों और उन पर की गई समीक्षाओं की सराहना की और कहा कि -
“आज की दोनों कहानियाँ कथा लेखिकाओं की बेहतरीन कहानियाँ हैं। 21वीं सदी में स्त्री कथाकारों की विकसित होती लंबी श्रृंखला है। आज ऐसे कई जरूरी स्त्री हस्ताक्षर कथा परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। उनकी लिखी कथाएं आज पाठकों की पहली पसंद है। उनकी यह जीवंत व महत्वपूर्ण उपस्थिति किसी कथित साहित्य शक्ति पुरुष की देन या किसी और के द्वारा दिलाया गया स्थान नहीं है बल्कि स्वयं उनकी अपनी हस्तक्षेप भरी रचनाधर्मिता, सक्रियता और श्रम से उपलब्ध वे मुकाम है जिन्होंने उन्हें कथा क्षेत्र में स्थापित किया है। स्त्री कथाकार अपनी मौलिकता ,टटकापन साबित करते हुए अछूते विषयों पर कलम चला रही है और एक स्त्री कथा पीढ़ी बड़ी तेजी से आगे बढ़ रही है।”
मुख्य अतिथि रामगोपाल तिवारी भावुक ने दोनों कहानियों पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि -
“आज कहानी संवाद में पढ़ी गई दोनों कहानियाँ मनोविज्ञान पर आधारित हैं। शकुंतला मित्तल की कहानी, ‘मैं डॉक्टर नहीं हूँ’, भ्र्म और स्मृति के बीच के अंतर को रेखांकित करती है। मनोविज्ञान जैसे कथानक पर कहानी लिखना बहुत कठिन है। उसके लिए कहानीकार को एक मनोचिकित्सक की भांति उपचार करना पड़ता है। यह कहानी पाठक को बांधे रखती है। मैंने जब यह कहानी पढ़ी तो एक बार में ही पूरी पढ़ गया।”
विशिष्ट अतिथि लक्ष्मीकांत जवणे ने रेणुका अस्थाना की कहानी, ‘दादी की सोनहँस’ की समग्र विवेचना की और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को रेखांकित करते हुए कहा कि -
“मन में करुणा का भाव आने पर भीतर ऑक्सीटोसिन (Oxytocin) हार्मोन बहता है। इस हार्मोन के अभाव में आदमी पत्थर जैसा बेहिस हुआ जा रहा है। कथ्य के साथ ही कलेवर के माप पर यह कहानी संतुलित है। कहानी के कथ्य की देह ही उसका क्लेवर होती है। कथ्य-कलेवर, सजीव, सलय, सरोकारऔर संतुलन जैसे प्रतिमानों पर रेणुका अस्थाना की कहानी खरी उतरती है।
यह कथा वृत्तात्मक है, इसमें अस्ताचल में जाता अतीत और उदयाचल से आता वर्तमान मिलकर इस गोले को पूरा करते हैं। उदास दादी के वार्धक्य में बिंदास तनु का बालपन स्त्रीत्व को जगाने में सफल हो जाता है। अपना बचपन, माहेश्वर का संग ये सब देह में आकर बहने लगते हैं और वह नारी की मोदमयता को तनु के झरने से पा लेती है।”
एक समय ऐसा भी आया जब विमर्श अपने उत्कर्ष पर तब पहुंचा जब वरिष्ठ कहानीकार, राजबोहरे ने अपनी टिप्पणी में दोनों कहानियों के अनकहे पहलुओं पर चर्चा की। उन्होंने इस सम्भावना से इनकार नहीं किया कि शकुंतला मित्तल की कहानी में केंद्रीय भूमिका में यदि डॉक्टर अपने पेशे से ईमानदारी नहीं बरतता तो मरीज का शोषण होना निश्चित था। रानी सुमिता ने भी रेणुका अस्थाना की कहानी पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इस कहानी में बाल मनोविज्ञान उभर कर आया है। डॉक्टर कर्नल गिरजेश सक्सेना चूँकि पेशे से डॉक्टर हैं। इसलिए उन्होंने एक मनोचिकित्सकीय दृष्टि कोण रखा और अपने अनुभव साझा कर वातारवण को संवेदनशील बना दिया। इस समय सभी ने अपनी आँखों में नमी महसूस की।
मशहूर ग़ज़ल सिंगर और साहित्यकार अर्चना पंड्या ने अपने ही अंदाज़ में सभी का स्नेहिल स्वागत किया। साहित्यकार और जानी मानी अभिनेत्री रत्ना पाण्डे ने सभी माननीय अतिथियों और दर्शकों का आत्मीय आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन मुज़फ्फर इक़बाल सिद्दीकी ने किया।
कहानी संवाद के इस कार्यक्रम में देश-विदेश से अनेक साहित्यकार, पत्रकार एवं कलाकार अंत तक उपस्थित रहे।
प्रस्तुति - मुज़फ्फर सिद्दीकी
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