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काव्य : मन की शुद्धि - डॉ. सत्येंद्र सिंह , पुणे, महाराष्ट्र।


 

काव्य : 

मन की शुद्धि


मन की शुद्धि  चाहो तो, अपने भीतर झाँको तुम,

दोष न खोजो औरों के, अपना ही मन आंकों तुम।

क्रोध, कपट, अभिमान, ईर्ष्या, मन के ही रोग हैं,

प्रेम, दया, संतोष, क्षमा ही मन के सच्चे योग हैं।

सत्संग की पियो सुधा, सत्य प्रेम का दीप जलाओ,

हरि-नाम की मधुर तान से अंतर्मन को महकाओ।

सेवा रत रह जो जीवन बीते, तो निर्मल होता  मन,

परहित में जो सुख को ढूंढ़े, पाता वही है सच्चा धन।

लोभ-मोह का जाल छोड़कर सत्य मार्ग अपनाना है,

हर प्राणी में प्रभु को देखो, मन को यही समझाना है।

प्रति दिन थोड़ी देर बैठकर, अपने कर्म निहारो तुम,

क्या खोया, क्या पाया जग में, इसको भी विचारो तुम।

जब मन निर्मल, भाव पवित्र, तब ईश्वर का वास मिले,

अंतर के इस पावन मंदिर में आनंद का  प्रकाश मिले।

मन की शुद्धि कोई कठिन नहीं, बस इतना उपाय करो,

प्रेम, दया और हरि सुमिरन से जीवन को साकार करो।

   -  डॉ. सत्येंद्र सिंह 

         पुणे, महाराष्ट्र।

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

1 Comments

  1. सत्येंद्र सिंह जी, निर्मल संदेशप्रद रचना के लिए साधुवाद!

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