काव्य :
पर्यावरण मुक्तक
कौन कहता है दरख्तों में ज़िंदगी नहीं होती,
पर हाँ इनकी अपनी कोई बंदगी नहीं होती।
धूप में खड़े सरे राह सबको बाँटते हैं छाँव
इतनी बड़ी मिसाल जहान में कहीं नहीं होती।
कौन कहता है दरख्तों में ज़िंदगी नहीं होती,
हर डाल पर कुदरत की रोशनी नहीं होती।
पक्षियों का बसेरा, राहगीरों का भी सहारा,
बिन इनके धरा पर कभी हरियाली नहीं होती।
कौन कहता है दरख्तों में ज़िंदगी नहीं होती,
इनके मन की भाषा किसी ने यूँ सुनी होती।
पतझड़ में भी हँसी नवपल्लव की सजावटें
हार मान लेना तो इनकी रवानी नहीं होती।
कौन कहता है दरख्तों में ज़िंदगी नहीं होती,
इनकी कथा किसी किताब में लिखी नहीं होती।
फल फूल छाँव दे जीवन सँवारना ही किताब है
बिना इस किताब के कोई जिंदगी नहीं होती।
- डॉ.सत्येंद्र सिंह
पुणे, महाराष्ट्र
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सत्येंद्र सिंह जी, पर्यावरण पर प्रेरणादायी कविता के लिए साधुवाद! 🙏
ReplyDeleteलतिका जाधव