काव्य :
कुछ बात करें
इस तपती दोपहरी में
हरियाली की बात करें
मन की शीतलता पाने को
सावन की बदली की बात करें,
जब घोर अंधेरा छाया हो
आशा भी धूमिल हो जाए
हम उम्मीदों का दीप लिए
सपनों का मान बढा जाएं
कुछ कमी नहीं इस मौसम में
बस खनक हरी चूड़ी की हो ,
आओ ,बैठें- गायें मिलकर,
बस यूँ ही मुलाकात करें .
ये धरा हमारा घर ही तो ,,,
क्यों विकृत रुप दिया इसको,
नदियां दूषित, परिवेश विषम
सांसों में कितना जहर घुला,
आओ विष अमृत धार करें
धरती अपनी, सागर अपना
अपनी नदियां,नव नीर भरी
उन्मुक्त हवा के पंखों पर
आओ हम प्रकृति-श्रृन्गार करें
मन अनुरागी जब हो जाये,
पलकों पर स्वप्न संवरते हों ,
तब इन्द्रधनुष के रंगो में -
मृदु जीवन की शुरुआत करें.
- पद्मा मिश्रा , जमशेदपुर झारखंड
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