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परवरिश का बदलता गणित : जब रिश्तों की पाठशाला घर से निकल गई, तब बच्चों को जीवन जीने की कला कौन सिखाएगा? - डॉ. रीटा अरोड़ा , करनाल


आलेख : 

परवरिश का बदलता गणित : जब रिश्तों की पाठशाला घर से निकल गई, तब बच्चों को जीवन जीने की कला कौन सिखाएगा?

          कभी किसी गाँव या पुराने मोहल्ले में जाकर बैठिए। वहाँ आपको एक दिलचस्प दृश्य दिखाई देगा। शाम ढलते ही बच्चे अपने घरों से बाहर निकल आते हैं। कोई साइकिल चला रहा है, कोई गिल्ली-डंडा खेल रहा है, कोई दादी से कहानी सुन रहा है और कोई पड़ोस की आंटी के हाथ से प्रसाद लेकर मुस्कुराते हुए घर लौट रहा है।

अब किसी महानगर की ऊँची इमारत में जाइए।

वहाँ भी बच्चे हैं, लेकिन अधिकांश अपने-अपने कमरों में हैं। किसी के हाथ में मोबाइल है, किसी के सामने टैबलेट, कोई ऑनलाइन क्लास में है तो कोई वीडियो गेम में। पूरी बिल्डिंग में सैकड़ों परिवार रहते हैं, लेकिन कई बच्चों को अपने सामने वाले फ्लैट में रहने वाले बच्चे का नाम भी नहीं पता।

यहीं से पेरेंटिंग की सबसे बड़ी चुनौती शुरू होती है।

गलती न्यूक्लियर परिवारों की नहीं है। समय बदल चुका है। पति-पत्नी दोनों का काम करना आज आर्थिक आवश्यकता भी है और व्यक्तिगत पहचान का हिस्सा भी। समस्या तब पैदा होती है, जब जीवन की भागदौड़ में हम यह मान लेते हैं कि बच्चे की परवरिश केवल अच्छी शिक्षा, अच्छा स्कूल और अच्छी सुविधाएँ दे देने से पूरी हो जाएगी।

वास्तव में, बच्चा केवल पढ़ाई से बड़ा नहीं होता।
वह वातावरण से बड़ा होता है।

बच्चे के व्यक्तित्व की पहली पाठशाला घर होती है, लेकिन उसके शिक्षक केवल माता-पिता नहीं होते। घर में आने वाले मेहमान, रिश्तेदार, पड़ोसी, दादा-दादी, भाई-बहन और परिवार के बीच होने वाले छोटे-छोटे संवाद भी उसके शिक्षक होते हैं। बच्चा यह देखकर सीखता है कि मतभेद होने पर बात कैसे की जाती है, बड़ों से कैसे मिला जाता है, किसी दुखी व्यक्ति को कैसे सांत्वना दी जाती है और खुशी को सबके साथ कैसे बाँटा जाता है।

दुर्भाग्य से आज यही पाठशाला धीरे-धीरे खाली होती जा रही है।

अब परिवार में बातचीत से अधिक नोटिफिकेशन सुनाई देते हैं। भोजन की मेज़ पर संवाद कम और स्क्रीन अधिक दिखाई देती हैं। छुट्टियाँ रिश्तेदारों के घर बिताने के बजाय मॉल या रिसॉर्ट में बीतने लगी हैं। बच्चे को हर सुविधा मिल रही है, लेकिन जीवन के वे दृश्य कम मिल रहे हैं, जिनसे सामाजिक व्यवहार विकसित होता है।

यही कारण है कि आज कई बच्चे आत्मविश्वासी दिखते हैं, लेकिन सामाजिक परिस्थितियों में असहज हो जाते हैं।

उन्हें किसी समारोह में लोगों से मिलना कठिन लगता है।
वे बातचीत जल्दी समाप्त कर देते हैं।
मतभेद होते ही संबंध तोड़ देना आसान समझते हैं।
किसी की आँखों में छिपी पीड़ा पढ़ने के बजाय वे केवल शब्द सुनते हैं।

ऐसा इसलिए नहीं कि उनमें संवेदनाएँ नहीं हैं, बल्कि इसलिए कि उन्हें संवेदनाओं का अभ्यास ही नहीं मिला। मनुष्य बोलना जन्म से नहीं जानता, वह सुन-सुनकर सीखता है। उसी प्रकार सामाजिक व्यवहार भी जन्मजात नहीं होता, वह देखकर सीखा जाता है।

यदि बच्चे के आसपास सहयोग, सम्मान, धैर्य और अपनापन दिखाई देगा, तो वही उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाएगा। लेकिन यदि उसका अधिकांश समय केवल मशीनों के साथ बीतेगा, तो उसकी दुनिया सूचना से तो भर जाएगी, पर अनुभवों से खाली रह जाएगी।

आज कई माता-पिता अपने बच्चों के भविष्य के लिए अत्यंत सजग हैं। वे उन्हें तैराकी सिखाते हैं, संगीत सिखाते हैं, कोडिंग सिखाते हैं और विदेशी भाषाएँ सिखाते हैं। यह सब आवश्यक भी है। लेकिन एक प्रश्न स्वयं से पूछना चाहिए-

क्या हमने उन्हें किसी बुज़ुर्ग के साथ बैठकर आधा घंटा बिताना सिखाया?
क्या हमने उन्हें परिवार के किसी छोटे निर्णय में शामिल किया?
क्या हम उन्हें कभी किसी बीमार पड़ोसी का हाल पूछने के लिए साथ लेकर गए?
क्या हमने उन्हें घर के छोटे-छोटे दायित्व सौंपे?

जीवन का पाठ्यक्रम केवल किताबों में नहीं मिलता। उसका बड़ा हिस्सा रोज़मर्रा के व्यवहार में छिपा होता है।

शायद इसी कारण पहले संयुक्त परिवारों में बच्चों को अलग से “पर्सनैलिटी डेवलपमेंट” नहीं सिखाना पड़ता था। पूरा परिवार ही व्यक्तित्व विकास की कार्यशाला हुआ करता था।

आज वह भूमिका माता-पिता को सचेत होकर निभानी होगी।

घर में “नो-स्क्रीन डिनर” की परंपरा शुरू की जा सकती है।
सप्ताह में एक दिन परिवार केवल बातचीत के लिए निकाल सकता है।
बच्चे को बाजार, बैंक या किसी सामाजिक कार्यक्रम में साथ ले जाना भी सीख का हिस्सा हो सकता है।

रिश्तेदारों से मिलना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि सामाजिक शिक्षा का अवसर बन सकता है।
घर में आने वाले मेहमान बच्चे के लिए व्यवधान नहीं, बल्कि जीवन के शिक्षक हैं।

हमें यह भी समझना होगा कि आने वाले समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता ज्ञान प्राप्त करना और आसान बना देगी। जानकारी अब किसी के पास सीमित नहीं रहेगी। लेकिन किसी व्यक्ति का विश्वास जीतना, विविध स्वभाव के लोगों के साथ काम करना, परिवार को साथ लेकर चलना और समाज में अपनी जगह बनाना-ये गुण किसी सॉफ्टवेयर से नहीं मिलेंगे।

यही भविष्य की असली प्रतिस्पर्धा होगी।

इसलिए पेरेंटिंग का उद्देश्य केवल सफल करियर बनाना नहीं होना चाहिए। उसका उद्देश्य ऐसा नागरिक तैयार करना भी होना चाहिए, जिसकी उपस्थिति से परिवार जुड़ें, समाज मजबूत हो और रिश्तों में गर्माहट बनी रहे।

क्योंकि अंततः किसी बच्चे की सबसे बड़ी उपलब्धि उसकी डिग्री नहीं होती।
उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह होती है कि लोग उसके ज्ञान से पहले उसके व्यवहार को याद रखें।
और शायद एक सभ्य समाज की शुरुआत भी यहीं से होती है।

- डॉ. रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर
शिक्षाविद्, लेखिका एवं प्रेरक वक्ता, करनाल
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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