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व्यंग्य :हल्ला तो इनका भी होना चाहिए - देवेंद्र कुमार रावत,भोपाल



व्यंग्य :

हल्ला तो इनका भी होना चाहिए

   गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के समापन पर मानव मन की कमजोरियों की सहज अभिव्यक्ति करते हुए संकेत दिया है:-
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभहिं प्रिय जिमि दाम ।
 तेमि  रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम ॥
                अर्थात् जिस प्रकार एक कामी (विषयासक्त) व्यक्ति को स्त्री सबसे अधिक प्रिय लगती है, और जिस प्रकार एक लोभी (लालची) व्यक्ति को धन (दाम) सबसे अधिक प्रिय होता है, हे रघुनाथ ! हे श्री राम ! ठीक उसी प्रकार आप मुझे निरंतर (हमेशा) प्रिय लगते रहें । यहाँ गोस्वामी तुलसीदास जी ने मन को विकल्प नहीं दिया है कि मन तुम राम के बदले काम और दाम को चुन लो, बल्कि यहाँ गोस्वामी जी ने यह बताने की कोशिश की है कि यदि राम के बदले दाम अधिक प्रिय लगे तो यह लाभ लोभ में बदलता जाता है, जिसका अंत दुखदायी ही होता है । श्री राम मंदिर चढ़ावा चोरी से भी यह स्पष्ट है कि जिन लोगों ने चोरी की, उन्हें राम जी के बदले 'दाम' ही प्रिय लगा है । वर्तमान में इस चोरी को दूसरे संदर्भ में देखें तो ऐसे कितने लोग हैं जो 'तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा' मानते हैं ? बल्कि सब 'मेरा-मेरा' मान करके घर भरते हैं और समाज में साहूकार जैसा सम्मान पाते हैं, ये भी सबसे बड़े चोर हैं । हल्ला तो इनका भी होना चाहिए, जिनके पास नेतागिरी के पूर्व दो समय की रोटी भी मुश्किल थी; और अब अगली 10 पीढ़ियों के लिए धन जोड़ लिया है । और वे अफ़सर, जिनके पास न गाड़ी थी, न घर था, जो कुछ था सब सरकारी था, वे आज आलीशान भवनों में रह रहे हैं और कई गाड़ियों के मालिक हैं । यदि उनके वेतन की आय से उनकी वर्तमान स्थिति की तुलना की जाए, तो स्पष्ट हो जाएगा कि यह सब ऊपरी कमाई है ।
               हल्ला तो उनका भी होना चाहिए जो गरीबों के हिस्से की रोटियों को छीनकर उन्हें काजू-बादाम में बदल देते हैं और स्वयं स्वर्ग के समान सुख भोग रहे हैं । चोरी तो वे सब भी कर रहे हैं, जो कामचोरी करते हैं और पूरा वेतन लेते हैं और उसके बदले भी काम करवाने वालों से मनमाना रुपया लेकर घर-परिवार का खर्चा चला रहे हैं । चोरी तो वे व्यापारी भी करते हैं, जो किसी वस्तु विशेष का कृत्रिम अभाव पैदा कर कालाबाजारी करके कई गुना धन कमाते हैं; इन्होंने भी तो 'राम जी की चिड़िया, राम जी का खेत' न मानकर स्वयं को ही संपत्ति का स्वामी मान लिया है । ऐसे चोरी करने वाले कितने लोग हैं ? उनके विरोध में कितनी एस.आई.टी. (SIT) गठित करोगे और कितनी जांच बिठाओगे ? अरे! राम मंदिर के चोरों को तो धन्यवाद देना चाहिए कि वे उजागर हो गए । हो सकता है उन्हें कठोर सजा मिलेगी, क्योंकि उनकी चोरी तो पकड़ी गई है, लेकिन अन्य सभी चोरों को सावधान हो जाना चाहिए कि वे राम जी को छोड़कर 'दाम' (धन) के पीछे पड़े हैं । पर राम जी तो सर्वव्यापी हैं । वे सब जानते हैं कि जो कर चोरी, कामचोरी या अन्य प्रकार की चोरी कर रहे हैं, उनके लिए अभी भले ही जेल का द्वार न खुला हो, लेकिन नर्क का द्वार आवश्यक रूप से खुल गया है; उन्हें तो नर्क की कठोर यातनाएं तो अवश्य भुगतनी पड़ेंगी । हमारे धर्मशास्त्रों में इसीलिए बार-बार 'लोभ' को पाप का मूल कहा गया है । पर इसे पाप का मूल मानने वाले कितने लोग हैं ? इसकी गिनती की जाए तो दुनिया की आबादी में बहुत ही कम लोग होंगे जो लोभ के 'पाश' (माया) के बंधन से बचते हैं; पर यह सच है कि यह फांसी का फंदा है । सभी धर्मों में इसीलिए यह मान्यता है कि हम धन कमाएं और उससे जो लाभ हो, उसमें संतोष भी करें; ताकि लाभ लोभ में न बदल पाए । अन्यथा "माया मिली न राम" वाली कहावत हम सबके जीवन में चरितार्थ होकर रहेगी, ऐसा हम सब प्रत्यक्ष देख-सुन भी रहे हैं कि ऐसे लोगों का अंत बहुत दुखदायी होता है ।
                 इस संदर्भ में मुझे महर्षि वाल्मीकि जी के पूर्व जीवन की वह कथा याद आती है, जिसमें वे डाकू के रूप में राहगीरों को लूटते थे । उस समय उन्होंने एक बार सप्तर्षियों को भी लूटना चाहा, तो उन्होंने डाकू से कहा कि, "भैया! पहले अपने घर यह तो पूछ कर आओ कि तुम यह गलत कमाई किसलिए कर रहे हो ?" वर्णन आता है कि वे घर गए और अपने परिजनों से पूछा कि, "मैं यह जो कमाई हत्या और लूटपाट करके लाता हूँ, क्या तुम मेरे इस पाप में सहभागी हो ?" तो घर के परिजनों ने कहा, "हमें इससे कोई मतलब नहीं है । हम तुम्हारे पाप में भागी कैसे हो सकते हैं ?" परिजनों की बात सुनकर उन्हें आत्मबोध (ज्ञान) हुआ और उन्होंने सप्तर्षियों के पास आकर क्षमा याचना की और उन्होंने लूटना छोड़ दिया । वही बाद में महर्षि वाल्मीकि कहलाये और रामायण जैसे जगत प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की। आज हम सबको भी इसी दिशा में सोचने की आवश्यकता है कि राम मंदिर में चढ़ावा चोरी करने वाले अज्ञानी होने से, इन्हें भले ही वाल्मीकि जी की तरह बोध न हो, पर जो अपने आप को ज्ञानी कहते हैं, कम से कम वे तो जानते हुए भी अनजान न बनें । हल्ला तो इनका भी होना चाहिए ।
    
    - देवेंद्र कुमार रावत,भोपाल
                                                                                           
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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