काव्य :
हम और जीवन
औरों का श्रम खरीदते हैं हम
और महंगे दामों पर बेचते हैं हम
जितना सस्ता खरीदे महंगा बेचे,
उसी को बड़ा आदमी कहते हैं हम।
वही बड़े आदमी नीतियाँ बनाते हैं
गरीबों के नाम पर स्वहित साधते हैं
विकास करते हैं और खूब कमाते हैं,
श्रम करने वाले श्रम करते ही जाते हैं।
मन के श्रम को कीमत सदा मिलती
शरीर को श्रम करते बीमारी मिलती
दोनों से ऊपर समझता है अब आदमी,
ईश्वर समझने की सदा इच्छा है रहती।
सब सुनाना चाहते हैं पर सुनना नहीं
फोलोवर चाहते हैं, फोलो करना नहीं
कोई हम से मैं कोई मैं से हम बनता है
पर आदमी बनना कोई चाहता नहीं।
क्षण भंगुर जीवन को जी न पाते हम
धरती आसमान पर कब्जा जमाते हम
और कर्ता बन समझ इठलाते हैं हम,
जड़ चेतन पर फिर भी बतियाते हैं हम।
कुछ नाटक करके जागरूक कर रहे
कुछ जागरूकता का नाटक कर रहे
पता ही नहीं कुछ नाटक के पात्र बने,
हम ऐसे ही अब जीवन यापन कर रहे।
- डॉ. सत्येंद्र सिंह,
पुणे, महाराष्ट्र
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काव्य
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सत्येंद्र सिंह जी,
ReplyDeleteआपने जीवन में भरी क्रूरता और नाटकीयता को सच्चाई से अभिव्यक्त किया है। समझकर भी नासमझ बनने का प्रयास करते जीवों की मानसिकता को स्पष्ट कर दिया है।
बहुत महत्वपूर्ण मुद्दों को उजागर करने के लिए साधुवाद! 🙏
सत्येंद्र सिंह जी,
ReplyDeleteआपने जीवन में भरी क्रूरता और नाटकीयता को सच्चाई से अभिव्यक्त किया है। समझकर भी नासमझ बनने का प्रयास करते जीवों की मानसिकता को स्पष्ट कर दिया है।
बहुत महत्वपूर्ण मुद्दों को उजागर करने के लिए साधुवाद! 🙏
सत्येन्द्र सिंह जी
ReplyDeleteबहुत महत्वपूर्ण मुद्दों को उजागर करने के लिए साधुवाद!