उलटबाँसी :
अधबीच में काकरोच
— विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल
सुनो साधो!
पहले काकरोच घर के कोनों में मिलते थे। बड़े समझदार जीव थे। जानते थे कि उजाले में निकलेंगे तो चप्पल पड़ेगी। इसलिए अँधेरे, सीलन और दरारों से अपनी पुरानी दोस्ती निभाते थे।
पर समय बड़ा शिक्षक है। पेपर लीक, व्यवस्था वीक और जनता की चीख ने काकरोचों को भी राजनीति पढ़ा दी।
अब वे कोनों में नहीं मिलते।
अधबीच में मिलते हैं।
रोटी और भूख के बीच।
सच और बयान के बीच।
कानून और न्याय के बीच।
जनता और व्यवस्था के बीच।
और जब से हर नाली का रास्ता जंतर-मंतर होकर जाने लगा, तब से काकरोचों ने भी समझ लिया कि सबसे सुरक्षित जगह कोना नहीं, व्यवस्था का अधबीच है। वहाँ जानलेवा चप्पल से अधिक बहसें चलती हैं, निर्णय नहीं।
फायर ब्रिगेड की गाड़ियों से बौछारें चलीं। लगा था काकरोच बह जाएँगे।
पर नालियों ने पानी कम, काकरोच ज़्यादा उगले।
दूर-दूर से बसों, ट्रेनों और गलियों से वे ऐसे उमड़े जैसे चुनाव आते ही वादे निकलते हैं—रंग-बिरंगे, आत्मविश्वासी और संख्या में अकूत।
सत्ता ने चप्पल उठाई।
सबसे बुज़ुर्ग काकरोच मुस्कराया—
"इतनी पुरानी तकनीक? अब इससे कुछ नहीं होगा।"
पुलिस ने 'हिट' छिड़का।
वह बोला—
"धन्यवाद! विरोध हमारे लिए वही काम करता है, जो खाद फसल के लिए करती है।"
अफसर ने फिनाइल बहाई।
काकरोच उसमें ऐसे तैरने लगे जैसे कुछ लोग योजनाओं के बजट में तैरते हैं।
झाड़ू उठाई ही थी कि सलाह आ गई—
"पहले यह सिद्ध कीजिए कि आपकी झाड़ू निष्पक्ष है।"
काकरोच अब कीट नहीं रहे थे।
वे प्रतिक्रिया बन चुके थे।
समाचार आया कि जंतर-मंतर पर उनका धरना चल रहा है।
तख्तियों पर लिखा था—
"अँधेरा हमारा मौलिक अधिकार है।"
"दरारें बचाओ, लोकतंत्र बचाओ।"
"चप्पल हिंसा है, सड़ांध सह-अस्तित्व है।"
देखते-देखते नेता पहुँच गए।
हर दल के दलदल में फँसे नेता काकरोच-फौज से मिलने लगे। उन्हें लगा—यह भविष्य का वोट बैंक है।
पहले ने कहा—
"काकरोच हमारी प्राचीन विरासत हैं।"
दूसरे ने कहा—
"इन्होंने सदियों का संघर्ष किया है।"
तीसरे ने घोषणा कर दी—
"हमारी सरकार बनी तो हर सीलन को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जाएगा।"
तालियाँ बजीं।
काकरोचों ने मूँछों पर ताव दिया।
पास बैठी छिपकली को पहली बार लगा कि लोकतंत्र सचमुच सबको अवसर देता है।
इधर एक गृहिणी अपनी रसोई बचाने में लगी थी।
उधर टीवी पर बहस चल रही थी—
"क्या चप्पल असंवैधानिक है?"
"क्या फिनाइल पर्यावरण-विरोधी है?"
"क्या सफ़ाई सामाजिक न्याय के विरुद्ध है?"
पाँच एंकर गरज रहे थे।
काकरोच चुपचाप पिज़्ज़ा, बर्गर, मैगी, ब्रेड और बिस्कुट कुतर रहे थे।
वे जानते थे—
खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे,
काकरोच मौज करे।
नगर निगम ने घोषणा की—
"इस वर्ष 'स्वच्छता सम्मान' उस मोहल्ले को मिलेगा जहाँ सबसे अधिक स्वस्थ काकरोच पकड़कर लाए जाएँगे।"
कारण पूछा गया।
उत्तर मिला—
"जैव-विविधता हमारी प्राथमिकता है।"
तर्क, कुतर्क से हार गया।
उसने चुपचाप अपना तबादला करा लिया।
एक बूढ़ी अम्मा शिकायत लेकर पहुँचीं—
"बाबू, रसोई काकरोचों से भर गई है।"
अधिकारी मुस्कराया—
"ऑनलाइन आवेदन कीजिए।"
"फिर?"
"जाँच होगी।"
"उसके बाद?"
"विशेषज्ञ समिति बनेगी।"
"तब तक?"
"सह-अस्तित्व का अभ्यास कीजिए।"
अम्मा लौट आईं।
उधर काकरोच अचार के मर्तबान पर विजय-नृत्य कर रहे थे।
तभी मुझे पहली बार काकरोचों पर दया आई।
वे बेचारे तो वही कर रहे थे जिसके लिए प्रकृति ने उन्हें बनाया है।
गलती उनकी नहीं थी।
गलती तो उनकी थी जिन्होंने सड़ांध को व्यवस्था और व्यवस्था को उपलब्धि घोषित कर रखा है।
काकरोच कभी गंदगी पैदा नहीं करते।
वे केवल यह बता देते हैं कि गंदगी कहाँ है।
जिस घर में वे अधिक दिखाई दें, समझ लीजिए वहाँ सफ़ाई कम हुई है।
और जिस समाज में उनकी पैरवी अधिक होने लगे, समझ लीजिए वहाँ सफ़ाई से अधिक सड़ांध की राजनीति होने लगी है।
आँखों पर काली पट्टी, गले में सफेद कॉलर-बैंड और तन पर काला कोट पहने कुछ स्वयंभू न्यायदेवताओं ने भी काकरोचों को मुख्यधारा का नागरिक बना दिया था।
अब झाड़ू से पहले उसकी नीयत की जाँच होती है।
चप्पल से पहले उसका चरित्र-प्रमाणपत्र माँगा जाता है।
सफ़ाई से पहले उसकी विचारधारा पूछी जाती है।
और गंदगी...
वह सम्मानित अतिथि की तरह मंच पर विराजमान रहती है।
सुनो साधो!
अब बसंती को डर कोनों में दुबके काकरोचों से नहीं लगता।
वे तो रोशनी होते ही भाग जाते हैं।
डर उन काकरोचों से लगता है जो अधबीच में आ बैठते हैं—
रोटी और भूख के बीच,
सच और झूठ के बीच,
कानून और न्याय के बीच,
आदमी और उसकी समझ के बीच।
और सबसे अधिक डर उन लोगों से लगता है जो दिखने में सभ्य होते हैं, पर अँधेरा मिलते ही अपने भीतर का काकरोच बाहर निकाल लेते हैं।
असल काकरोच तो केवल सड़ांध में जीते हैं।
पर मनुष्य जब सड़ांध को ही सिद्धांत बना ले, तब वह हर काकरोच से अधिक भयावह हो जाता है।
-विवेक रंजन श्रीवास्तव
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