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व्यंग्य :विकास के मतलब ? -डाॅ. कौशल किशोर श्रीवास्तव , छिंदवाड़ा


व्यंग्य :

विकास के मतलब ?  

सरकार ने जब काफी विकास कर लिया तब उत्सुकता हुई कि देखें कि उसने देश से कितना विकास खींचा। इस सर्वेक्षण के लिये उसने अलग-अलग समितियां बनाई इस तरह उसकी पार्टी के मुफ्तखोर काम पर लग गये। मुख्य समिति ने कुछ बिन्दु अलग अलग सर्वेक्षण समितियों को दिये-
(1) समाज के व्यक्तियों का विकास के बारे में ज्ञान।
(2) भिन्न-भिन्न वर्गों का विकास।
(3) उनसे धनात्मक उत्तर प्राप्त करना।
समितियों ने सरकारी मुद्दे सरकारी कचरा घरों में फेंके और सरकारी कामों से तफरीह पर निकल गईं। गरीब सर्वेक्षण समिति एक गरीब के घर गई। गरीब घर, डर गया। सरकार से हर वर्ग डरता है और सरकार उसके घटकों से डरती है। सरकार देष के डर का प्रतिनिधित्व करती है और डर से ही चलती है। उस घर के सदस्य न्यूनाधिक वस्त्रावृत्त थे। फटे कपड़े उनकी इज्जत को बाहर आने का असफल प्रयत्न कर रहे थे। हर वर्ग को आदेष थे कि वे सरकारी सर्वेक्षण दल का यथा संभव सत्कार करें। सर्वेक्षण दलों को  आदर करवाने का अधिकार दिया गया था। उस दल ने भी आदर करवाया। उन्हें जो चाय प्रस्तुत की गई वह गरीब परिवार के हिसाब से उत्कृष्ट पर स्वागत करवाने वाले दल के हिसाब से रद्दी चाय थी। समिति ने गरीब से पूछा ‘‘श्रीमान गरीब आपकी दृष्टि में प्रगति का मतलब क्या है?’’
गरीब ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया ‘‘हुजूर, विकास का मतलब भुखमरी का बढ़ना है।’’ हमारे जिन्दा रहने के अधिकार छिनते जा रहे हैं। समिति ने पूछा ‘‘तो ये तुम्हारी भुखमरी के अधिकार बढ़े हैं या घटे हैं।’’ गरीब ने उत्तर दिया: बढ़े हैं हुजूर। समिति ने पूछा ‘‘तो तुम्हारी नज़रों में देश का विकास हुआ है।’’ गरीब ने कहा ‘‘हाँ हुजूर अब हम पहले से अधिक भूखों मर रहे हैं। समिति ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि गरीब की नजरों में देश का विकास हुआ है।
सरकार ने बेरोजगारी खत्म करने का वादा किया था। इसलिये ऐसे बेरोजगारों का साक्षात्कार लेना आवष्यक था, जिनकी बेरोजगारी खत्म हो गई हो। समिति ऐसी झोपड़ी के सामने रूकी जिस पर पूर्व बेरोजगार युवक लिखा था। उन्होनें घांस-फूस के दरवाजे पर डन्डे मारे तो एक बा रोजगार युवक बाहर निकला। उसने निकलते ही गिड़गिड़ाना चालू कर दिया। हाथ फैलाकर बोला ‘‘दे दे बाबा ऊपर वाले के नाम पर दे दे। 100/- का सवाल है। मोबाइल को ‘री-चार्ज’ करवाना है। समिति चकरा गई। समिति ने पूछा ‘‘तुमने तो बा-रोजगार लिख रखा है।’’ युवक बोला ‘‘हाँ अब मैं भीख मांगने लगा हूँ। यही रोजगार करने लगा हूँ। समिति ने पूछा ‘‘तेरी शैक्षणिक योग्यता कहां तक है।’’ ‘‘जी’’ वह युवक बोला ‘‘आय एम गोल्ड मेडलिस्ट एम.ए.इन हिन्दी लिटरेचर’’। समिति ने कहा पर तुमने तो लिखा है पूर्व बेरोजगार।’’ वह युवक बोला ‘‘तो आप ही कोई नौकरी या रोजगार दिला दीजिए। प्रधानमंत्री जी ने कहा था कि अपने रोजगार खुद पैदा करो तो मैंने कर लिया।’’
समिति एक ईमानदार शिक्षित युवक को कोई नौकरी नहीं दिला सकती थी। समिति ने पूछा ‘‘तो तुम्हारा मानना है कि पूर्वापेक्षा बेरोजगारी में विकास हुआ है। वह बोला ‘‘जी’’ और उसने अन्दर घुसकर झोपड़ी बंद कर ली। बेइज्जत समिति ने रिपोर्ट में लिखा कि बेरोजगारी में देश का विकास हुआ है, अतः हम विकसित हो गये हैं।
प्रधानमंत्री जी ने कहा था कि केन्द्र में भ्रष्टाचार समाप्त हो गया है। भ्रष्टाचार सर्वेक्षण समिति एक ऐसे कार्यालय गई जहां भ्रष्टाचार पहले से ही नहीं होता था। मगर इस बार वहां नजारा ही दूसरा था। रिष्वत पर सार्वजनिक झगड़ा हो रहा था। एक बाबू दस हजार रूपये रिष्वत मांग रहा था पर दाता नौ हजार नौ सौ पिंच्यानवे दे रहा था। मामला केवल पाँच रूपये पर अटका था और आधा घन्टे से आगे सरक ही नहीं रहा था।
समिति ने लालू से पूछा ‘‘मगर प्रधानमंत्री तो कह रहे हैं कि भ्रष्टाचार खत्म हो गया है।’’
बाबू ने जवाब दिया ‘‘कहने वाले को कौन रोक सकता है। अब किसी को झूठ बोलने की आदत है तो हम और आप कौन होते हैं रोकने वाले?’’ समिति में सन्नाटा छा गया। फिर थोड़ी देर बाद अवसाद से उबर कर बोली ‘‘तो आपका कहना है कि भ्रष्टाचार में विकास हुआ है।’’ वह  बोला ‘‘ है  ताकत विकास रोकने की?’’ हमने विकास के नाम पर वोट दिया है तो विकास करेंगे ही। समाज के हर क्षेत्र में विकास हो रहा है तथा गरीबी में, बेरोजगारी में , रिश्वतखोरी में, धोखेबाजी में और इत्यादि में। अभी तीन समितियों की रिपोर्ट आना बाकी थी। नोट बंदी का विकास पर असर, जी.एस.टी. का विकास पर असर, स्वच्छता और आम आदमी पर विकास का असर । नोटबंदी का विकास पर असर देखने वाली समिति एक सम्मानित ग्राहक के पास गई। उससे पूछा ‘‘नोट बंदी का विकास पर क्या असर हुआ है?’’ वह प्रबुद्ध ग्राहक बोला ‘‘सरकार हमारा पैसा दबा कर विजय माल्या आदि का घाटा पूरा कर रही है। हमसे सार्वजनिक घाटा पूरा किया जा रहा है और माल्या से व्यक्तिगत फायदा ले रही है। इस तरह सरकार का सार्वजनिक रूप से और घटकों का व्यक्तिगत रूप से फायदा हो रहा है।’’ समिति ने नोट किया कि विकास हो रहा है। फिर पूछा कि तुम्हारा क्या नुकसान हो रहा है? वह तड़ाक से बोला ‘‘क्यों, क्या फिक्सड डिपाजिट पर ब्याज दर कम हुई कि नहीं? बचत खाते में ब्याज दर कम हुई या नहीं? उसके ऊपर कल मेरी लड़की की षादी है और मुझसे मैनेजर कह रहा है कि आज तो हम पांच हजार दे भी रहे हैं, कल हो सकता है कि पांच सौ भी न मिलें। हमारा पैसा हमें नहीं विजय माल्या को मिल रहा है। अब जी.एस.टी. का व्यापारियों पर असर देखना बाकी था। जी.एस.टी. समिति एक गुमटी पर रुकी। उससे पूछा ‘‘जी.एस.टी. से आपको क्या फायदा हुआ? वह बोला ‘‘हुजूरो, पहले हमारा बड़ा षोरूम था, अब वह गुमठी रह गई। हर माह जी.एस.टी. फार्म भरने के पांच हजार रूपये सेल्स टैक्स वकील को देना पड़ते थे। क्योंकि फार्म बहुत ही क्लिष्ट है। इस सरकार से कुछ ही व्यापारिक घरानों का विकास हुआ है। उसे ही आप देष का विकास कह सकते हैं।’’
अंत में आम आदमी के पास आम आदमी सर्वेक्षण समिति गई, उससे पूछा ‘‘विकास का आप क्या मतलब लेते हैं?’’ वह बोला ‘‘बन्दरों की तरह उछलने को विकास कहते हैं। विकास के लिये आवष्यक है कि बन्दरों के हाथ में उस्तरा दे दिया जाये। वही हमने किया और खुद को लहुलुहान कर बैठे। न तो रोजगार बढ़ाने कोई विदेषी कम्पनी आई और न ही पड़ोसी देषों से रिष्ते सुधरे। हमारे प्रधानमंत्री ‘तू कौन, मैं ख्व्वाम खाह।’ की तर्ज पर यहां वहां पंगत खाने चले जाते हैं।
सरकार स्वच्छता पर बहुत ध्यान दे रही है, अच्छा है। पर पड़ोस के साहब कुत्ता घुमाने लाते हैं और मेरे घर के सामने खुद ऊपर की गंदगी और कुत्ता नीचे की गंदगी कर जाता है। हमारे घर के आगे की सड़क साफ करने के तुरन्त बाद आवारा कुत्ते गंदगी कर निचला हिस्सा पौंछ जाते हैं। साहबों से कहा जाये कि वे उनके कुत्ते के लिये षौचालय बनवायें और सरकार सार्वजनिक कुत्ता षौचालय बनवाकर आवारा कुत्तों को उन्हीं में पेट साफ करने की आदत सिखलाये।
सार्वजनिक षौचालयों में इन्जीनियर सोख्ता गड्ढ़ा नहीं बनवा रहे हैं। समतल सतह पर केवल ‘सीट’ रखकर उनका उदघाटन करवा रहे हैं। अब एक आदमी कितने दिनों तक उनका उपयोग करे। अन्त में सब समितियों का प्रतिवेदन एकत्रित किया गया और निर्णय प्रकाशित करवाया गया कि देश का सर्वांगीण विकास तेजी से हो रहा है।

-डाॅ. कौशल किशोर श्रीवास्तव
171 विशु नगर परासिया मार्ग, छिंदवाड़ा (मध्यप्रदेश)
मो. 9424636145
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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