तुलसी साहित्य में विनय पत्रिका
सुनी केवट के बेन,प्रेम लपटे अटपटे |
वहिसे करुना ऐन, चितये जानकी लखन तन ||
महाकवि तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में गंगा किनारे केवट और राम के संवाद में उक्त पंक्तियां लिखी हैं | इन अटपटे वचनों से प्रभु का प्रसन्न होने की बात समझ आ गई कि प्रभु की प्रसन्नता के लिए भाव होना चाहिए भाषा चाहे कैसी भी हो | रामचरितमानस में तो उन्होंने मर्यादा का पूर्ण पालन किया और राम के क्षेत्र की बोली अवधि में लिखी | पर विनायक पत्रिका और गीतावली आदि में मीठी बोली बृज भाषा में लिखी | हनुमान चालीसा से लेकर विनय पत्रिका तक बारह ग्रन्थ लिखे है | विनय पत्रिका संभवत है उनकी अंतिम रचना है | सभी ग्रंथ अद्भुत है | विनय पत्रिका की मुझे दो विशेषताएं बड़ी रुचिकर लगी |
1 सभी देवताओं और प्रभु राम से बड़े अंतरंगता से विनय की है और प्रभु भक्ति मांगी हैं |
2 तुलसीदास जी ने विनय पत्रिका में अपने दार्शनिक स्वरूप का अपना मंतव्य प्रस्तुत किया है |
आईये इन विशेषताओं को कुछ उदाहरण द्वारा समझते हैं |
1 अंतरंगता से विनय :-
मानस में हनुमान जी से इस प्रकार विनय की गई
प्रनवउँ पवनकुमार,
खल बन पावक ग्यान घन,
जासु हृदय आगार,
बसहिं राम सर चाप धर ।
अतुलित बल धम्म हेम शैलाभि देहम् ----
पारंपरिकमर्यादित व वंदना का प्रयोग देखने को मिलता है इसके विपरीत विनय पत्रिका में
पद 32
ऐसी तोहि न बुझिये हनुमान हठीले |
साहेब कहूंगा राम से, तोसे न उसीले ||1||
तेरे देखत सिंह के सिसु मेंढक लीले |
जानत हौ कली तेरेऊ गुणगन कीले ||2||
से हठीले हनुमान तुझे ऐसा नहीं करना चाहिए |श्री राम के जैसे तो कहीं स्वामी नहीं है और तेरे सामान कहीं सहायक नहीं है | यह सब होते हुए भी आज तेरे देखते देखते मुझे सिंह के बच्चे को तुझ समर्थ राम सेवक के शरणागत मुझे बालक को कलयुग रूपी मेंढक (जिसकी तेरे सामने कोई हस्ती नहीं है )निगले लेता है | मालूम होता है इस कलयुग में तेरी भक्ति चला शरणागत की रक्षा के लिए हठकारिता उदारता आदि गुणों को कील दिया (समाप्त कर दिया )है |
इसी प्रकार शंकर जी और लक्ष्मण की याद की वंदना में तुलसीदास जी ने बड़ी विनम्रता से परंतु अपनी ही शैली में मधुर भाषा में बड़ा आत्मीय निवेदन किया है |
तुलसी का दार्शनिक विचार
तुलसी के दार्शनिक विचार :- विनय पत्रिका तुलसीदास जी के दार्शनिक विचारों से ओतप्रोत हैं | वह किसी भ्रम में नहीं रहना चाहते | न हि किसी बड़े दार्शनिक विचार तो उलझाने वाले है |
पद 111
केशव कहीं न जाये का कहिये |
देखत तब रचना विचित्र हरि!
समझ में मनहिं मन रहीये ||1||
शून्य भीति पर चित्र, रंग नहिं,
तनु बिनु लिखा चितेरे|
धोये मिटइ न मरई भीति,
दुख पाइये एहि तन हेरे ||2||
रविकर नीर बसै अति दारुन
मकर रूप तिही माही |
बदनहीन सो ग्रसे चराचर,
पान करन जे जाही ||3||
कोउकह सत्य झूठ काहे कोऊ,
जुगल प्रबाल कोउ मानै |
तुलसीदास परिहरै तीन भ्रम,
सो आपन पहचाने ||4||
इस पद में तुलसीदास जी ने एक सुंदर रूपक बनाकर संसार की तुलना उसे चित्र से कर दी है जिसको बिना शरीर वाले चित्रकार ईश्वर ने जिसके लिए उन्होंने मानस में लिखा है
बिना पद चले सुने बिन काना |
बिन कर कराई कर्म विधि नाना ||
इसमें उसने इच्छा रूपी एक मगर भी छोड़ रखा है जो चराचर जीवन को खाता रहता है |
कोई कोई संसार को सत्य कहता है कोई झूठ कहता है कोई दोनों ही सही कहता है | पर तुलसीदास जी की दृष्टि में तो तीनों ही भ्रम है मात्र इसे ईश्वर की लीला है ऐसा समझने वाला ही अपने आप को और ईश्वर को समझ सकता है |
इस पर मैं तुलसीदास जी ने अपना दर्शन स्पष्ट रूप से बता दियाहै |
तुलसीदास जी पद 102 में कहते हैं
"है श्रुति विदित उपाय सकल सुर,
केहि केहि दिन निहोरे |
तुलसीदास येहि जीव मोहि रजु,
जेहि बांधो सोई छोरे ||5||
आगे भी पद 114 में लिखते हैं
" तुलसीदास प्रभु मोह श्रृंखला,
छूट है तुम्हारे छोरे |"
इस पद में भी तुलसीदास जी ने पूर्व पद की ही प्रतिध्वनि की है |
रामचरितमानस के उत्तराखंड के दोहा क्रमांक 118 ख में कहा है
कहत से कठिन समझत कठिन,
साधत कठिन विवेक |
हुई घुनाक्षर न्याय जो,
पुनि प्रत्यहू अनेक ||118 ख||
यहां कवि ने अपने उत्तर कांड में लिखित ज्ञान में दीपक की दुरूहता की ओर संकेत कर सीधा सच्चा उपाय भक्ति को ही सुलभ बताया है | उन्होंने कहा है
अति दुर्लभ केवल परम पद |
संत पुराण निगम आगमबद ||
राम भजत सोई मुक्त गोसाई |
अनिश्चित आवइ बरी आई ||2/119/7||
विनय पत्रिका के 79 वे में पद में उन्होंने कहा है
तोहि मोहि नाते अनेक मानिए जो भावे |
जिओं त्यों तुलसी चरण शरण सुख पावे ||
विनय पत्रिका रामचरितमानस का एक ओर एक पूरक ग्रंथ है वहीं दूसरी ओर अनुपम एवं अनेक रहस्याओं से भरा हुआ है| इसमें न जाने कितने आयाम है | तुल्सज दास जी तो केवल कैसे भी हो राम भक्ति चाहते हैं |
विनय पत्रिका का 79वा पद इस प्रकार है
तु दयालु दीन हों, तू ही धनी हो भिखारी |
हो प्रसिद्ध पातकी, तू पाप पुंज हारी ||
नाथ तु अनाथ को, अनाथ कौन मोसो |
मो समान आरत नहीं, आरत हर तोसो ||
ऐसी अद्भुत ग्रंथों के प्रणेता भक्त शिरोमणि महाकवि तुलसीदास के चरणों में नमन |
- आंनद मोहन सक्सेना
21,हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी दतिया ( म. प्र.)
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