संस्कृत के शाश्वत ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने उनके हिंदी , अंग्रेजी अनुवाद आवश्यक हैं
— विवेक रंजन श्रीवास्तव
"संस्कृतं नाम दैवी वागन्वाख्याता महर्षिभिः।"
अर्थात् संस्कृत वह दिव्य वाणी है जिसे महर्षियों ने मानवता के कल्याण के लिए अभिव्यक्त किया। यह भारतीय सभ्यता, संस्कृति, दर्शन, विज्ञान और अध्यात्म की शाश्वत संवाहिका भाषा है। वेदों की ऋचाओं , उपनिषदों के गंभीर चिंतन, वाल्मिकी रामायण और महाभारत के आदर्शों, भगवद्गीता के कर्मयोग, कालिदास के काव्य-सौंदर्य, आर्यभट्ट और भास्कराचार्य के गणित, चरक और सुश्रुत के आयुर्वेद तथा पाणिनि के अद्भुत व्याकरण तक, भारतीय ज्ञान-विज्ञान की विशाल परंपरा संस्कृत में परिलक्षित होती है।
विश्व की अनेक भाषाओं और भाषाविदों ने संस्कृत की वैज्ञानिक संरचना, ध्वन्यात्मक शुद्धता और व्याकरणिक पूर्णता की प्रशंसा की है। पाणिनि की अष्टाध्यायी आज भी भाषा-विज्ञान का अनुपम ग्रंथ मानी जाती है। संस्कृत का प्रत्येक शब्द अर्थ, ध्वनि और व्याकरण की दृष्टि से अत्यंत सुव्यवस्थित है। यही कारण है कि आधुनिक संगणकीय भाषाविज्ञान (Computational Linguistics) के क्षेत्र में भी संस्कृत की संरचना पर गंभीर अध्ययन हो रहे हैं।
किन्तु संस्कृत का यह विराट साहित्य आज सामान्य जन की पहुँच से धीरे-धीरे दूर होता जा रहा है। नई पीढ़ी में संस्कृत अध्ययन का दायरा सीमित हुआ है। परिणामस्वरूप जेन जी के वे लोग भी, जो भारतीय ज्ञान-परंपरा को समझना चाहते हैं, भाषा की कठिनाई के कारण मूल ग्रंथों तक नहीं पहुँच पाते।
ऐसे समय में जो विद्वान संस्कृत के अमूल्य ग्रंथों को उनकी मूल आत्मा, काव्य-सौंदर्य और सांस्कृतिक गरिमा के साथ हिंदी में प्रस्तुत करते हैं, वे वस्तुतः भारतीय संस्कृति के सेतु-निर्माता हैं।
भारतीय परंपरा में आत्मप्रशंसा को सदैव अनुचित माना गया है। यही कारण है कि हमारे अनेक महापुरुषों के जीवन-वृत्त सीमित रूप में उपलब्ध हैं, जबकि उनकी कृतियाँ विश्वभर में आदरपूर्वक पढ़ी जाती हैं। महाकवि कालिदास इसका सर्वोत्तम उदाहरण हैं। मेघदूतम्, रघुवंशम्, कुमारसंभवम् तथा अभिज्ञानशाकुन्तलम् जैसी रचनाएँ विश्व साहित्य की धरोहर हैं। इन ग्रंथों का सामान्य गद्य-अनुवाद उपलब्ध है, परंतु अनुवाद की अपनी सीमाएँ होती हैं। भाषा का अर्थ तो पहुँच जाता है, पर काव्य का रस, लय, संगीतात्मकता, अलंकार-वैभव और भाव-सौंदर्य प्रायः क्षीण हो जाते हैं।
ऐसे समय में विद्वान साहित्यकार एवं शिक्षाविद् स्व प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव 'विदग्ध' का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने महाकवि कालिदास के मेघदूतम् के सभी श्लोकों तथा रघुवंशम् के उन्नीसों सर्गों के लगभग 1800 श्लोकों का श्लोकानुसार हिंदी गेय छंदों में भावानुवाद किया है। उन्होंने भगवत गीता का भावानुवाद प्रत्येक छंद का छनदानुसार हिंदी , अंग्रेजी में किया है।यह कार्य केवल भाषांतरण नहीं, बल्कि मूल काव्य की आत्मा का पुनर्सृजन है।
प्रो. श्रीवास्तव ने अपने पद्यानुवादों में संस्कृत काव्य की लय, भाव और सौंदर्य को यथासंभव सुरक्षित रखा है। उनका उद्देश्य केवल अर्थ स्पष्ट करना नहीं, बल्कि पाठक को वही काव्यानुभूति देना है जो मूल संस्कृत पाठ के अध्ययन से प्राप्त होती है। इस दृष्टि से उनका कार्य संस्कृत और हिंदी साहित्य के मध्य एक सशक्त सांस्कृतिक सेतु है।
गीता केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए जीवन-दर्शन का अमूल्य ग्रंथ है। कर्म, कर्तव्य, समत्व, आत्मसंयम, नेतृत्व, निर्णय क्षमता और जीवन-प्रबंधन जैसे सार्वकालिक सिद्धांत इसे युगों-युगों तक प्रासंगिक बनाते हैं। आज की जेन जी पीढ़ी यदि गीता के संदेश को सहज भाषा में समझ सके, तो उसके व्यक्तित्व, नैतिक आचरण और सामाजिक दृष्टि का विकास संभव है।
प्रो. श्रीवास्तव की अनुवाद विशेषता यह है कि वे प्रत्येक संस्कृत श्लोक के साथ समान भावभूमि वाला हिंदी छंद प्रस्तुत करते हैं। पाठक मूल संस्कृत, हिंदी पद्यानुवाद , अंग्रेजी अनुवाद और भावार्थ, तीनों का एक साथ अध्ययन कर सकता है। यह पद्धति न केवल साहित्यिक आनंद देती है, बल्कि संस्कृत सीखने की प्रेरणा भी जगाती है।
यह कार्य उनकी सतत साधना और संस्कृत-निष्ठा का प्रमाण है। उन्हें इसके लिए गार्गी अनुवाद सम्मान से राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार भी दिया गया है।
आज आवश्यकता केवल संस्कृत के संरक्षण की नहीं, बल्कि उसके लोकप्रिय प्रसार की भी है। संस्कृत तभी जीवंत रहेगी जब उसका ज्ञान विश्वविद्यालयों की सीमाओं से निकलकर सामान्य जन तक पहुँचेगा। इस दिशा में उत्कृष्ट पद्यानुवाद अत्यंत प्रभावी माध्यम सिद्ध हो सकते हैं। विद्यालयों, महाविद्यालयों, पुस्तकालयों, डिजिटल मंचों और सामाजिक माध्यमों पर ऐसे साहित्य का व्यापक प्रसार समय की आवश्यकता है।
शासन एवं सांस्कृतिक संस्थाएँ प्रतिवर्ष संस्कृत के संवर्धन पर पर्याप्त संसाधन व्यय करती हैं। यदि प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव 'विदग्ध' जैसे साधकों की कृतियों को राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित, डिजिटाइज़ तथा अन्य विभिन्न भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराया जाए, तो संस्कृत के प्रति नई पीढ़ी का आकर्षण स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा। यह संस्कृत सप्ताह जैसे आयोजनों को भी स्थायी और सार्थक दिशा देगा।
संस्कृत भारत की आत्मा की भाषा है। यह भाषा केवल अतीत का गौरव नहीं, बल्कि भविष्य का भी आलोक है। जो साधक अपने जीवन का अमूल्य समय इस ज्ञान-संपदा को नई पीढ़ी तक पहुँचाने में समर्पित करते हैं, वे वास्तव में राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना के प्रहरी हैं।
संस्कृत सप्ताह के अवसर पर ऐसे मनीषी के योगदान का स्मरण और सम्मान करना वस्तुतः संस्कृत, भारतीय संस्कृति और हमारी सनातन ज्ञान-परंपरा के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना है।
"यावत् स्थास्यन्ति गिरयः सरितश्च महीतले।
तावत् संस्कृतसंस्कृतिः मानवता को आलोकित करती रहेगी।"
- विवेक रंजन श्रीवास्तव
(इन दिनों लंदन में)
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