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समय से पहले का विराम, मंज़िल की नई शुरुआत - डॉ. रीटा अरोड़ा , करनाल


आलेख : 

समय से पहले का विराम, 
मंज़िल की नई शुरुआत

      कभी-कभी ज़िंदगी हमारी योजनाएँ इसलिए बदल देती है, ताकि हमें किसी बड़े हादसे से बचाकर एक बेहतर मंज़िल तक ले जा सके।

"माँ, आज की फ्लाइट छूट गई... सब कुछ बर्बाद हो गया!" एयरपोर्ट से बेटे की आवाज़ में खीझ और हताशा साफ झलक रही थी। महीनों की तैयारी, ज़रूरी मीटिंग और ऐन वक्त पर लगा लंबा ट्रैफ़िक जाम।

माँ ने सहज भाव से कहा, "बेटा, गहरी सांस लो। जो छूट गया, वह सिर्फ़ एक सफ़र था, ज़िंदगी नहीं। हर रुकावट नुकसान ही हो, यह ज़रूरी नहीं होता।"

बेटा झुँझलाया, "माँ, आप हर बार सकारात्मकता का उपदेश देने लगती हैं!"

लेकिन कुछ ही घंटों बाद जब उस मार्ग पर आए भीषण तूफ़ान और आपातकालीन परिस्थितियों की सूचना मिली, तो बेटे के हाथ काँप गए। उसने दोबारा फोन मिलाया और रुंधे गले से कहा—

"माँ... आज समझ आया कि कभी-कभी रुक जाना, आगे बढ़ जाने से ज़्यादा सुरक्षित होता है।"


हम सब अपने जीवन की एक सुव्यवस्थित पटकथा तैयार करके चलते हैं:

किस उम्र में डिग्री हाथ में होगी,
कब सपनों की नौकरी मिलेगी,
कब परिवार और आशियाना बसेगा, और
किस मोड़ पर कितनी कामयाबी दर्ज होगी।

जैसे ही कोई पन्ना हमारी लिखी पटकथा से अलग मुड़ता है, हम विचलित हो उठते हैं। कोई मनचाहा पद हाथ से निकल जाता है, वर्षों पुराना विश्वास टूट जाता है या किसी सपने के दरवाज़े पर ताला लग जाता है। उस पल मन चीख उठता है—"मेरे ही साथ ऐसा क्यों?"

जापान की एक प्रसिद्ध कहावत है: "यदि आप नाव पर चढ़ने से रह गए हैं, तो समंदर के तूफ़ान को भी देखने का धैर्य रखिए।"

इसका अर्थ यह नहीं कि हर असफलता कोई चमत्कार लेकर आएगी, बल्कि यह है कि जीवन का पूरा कैनवास एक ही नज़र में कभी स्पष्ट नहीं होता।


किसी परीक्षा में असफल होना आपकी प्रतिभा का अंतिम मूल्यांकन नहीं है। किसी रिश्ते का बिखरना आपके स्नेह के अयोग्य होने का प्रमाण नहीं है।

अक्सर बंद दरवाज़े हमें यह समझाने के लिए होते हैं कि जिस दीवार पर हम सिर पटक रहे हैं, वह कभी हमारा रास्ता थी ही नहीं।

जिस कॉलेज में दाखिला नहीं मिला, उसने किसी नए शहर में नया व्यक्तित्व गढ़ा।
जिस नौकरी के छूटने पर आँसू बहाए, उसने स्वतंत्र उड़ान का हौसला दिया।
जिस विदाई ने भीतर से खाली किया, उसी खालीपन ने नई खुशियों को जगह दी।

यह सोच भाग्यवाद या हाथ पर हाथ रखकर बैठने की वकालत नहीं करती। कर्म, श्रम और निरंतर सीखने का कोई विकल्प नहीं है।

लेकिन जहाँ हमारी सीमाओं का अंत होता है, वहाँ स्वीकार्यता की शुरुआत होनी चाहिए।

स्वीकार्यता का अर्थ घुटने टेकना नहीं है; इसका अर्थ है व्यर्थ के पछतावे में ऊर्जा नष्ट करने के बजाय शांत मन से यह पूछना-

"अब इस नए मोड़ से मैं कौन सा रास्ता चुनूँ?"

आज का समाज हर सफलता पर समय की मुहर लगाना चाहता है। दूसरों की पदोन्नति, गाड़ियाँ और उपलब्धियाँ देखकर हमें लगता है कि हम दौड़ में पीछे छूट गए।

याद रखिए, ज़िंदगी कोई सौ मीटर की स्प्रिंट नहीं है जहाँ सबको एक ही सीटी पर दौड़ना है।

हर व्यक्ति की ऋतु अलग होती है।
हर बीज के अंकुरित होने का समय अलग होता है।
हर किसी की यात्रा और मंज़िल की तासीर अलग होती है।

जब अगली बार कोई बनी-बनाई योजना बिखर जाए तो दुख ज़रूर मनाइए, पर उस मोड़ को अपनी ज़िंदगी का अंतिम फ़ैसला मत मान लीजिए।

वक़्त को थोड़ा वक़्त दीजिए। आज का अनचाहा मोड़, कल की सबसे खूबसूरत शुरुआत बन सकता है।

जीवन के हर मोड़ पर रोशनी तुरंत नहीं दिखती; पर यदि कदम सच्चे हों तो हर भटकाव अंततः अपनी सही मंज़िल ढूंढ ही लेता है।

-  डॉ. रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर
करनाल
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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