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लंदन डायरी : गांधी की लंदन यात्राएँ- विवेक रंजन श्रीवास्तव


लंदन डायरी :

गांधी की लंदन यात्राएँ

- विवेक रंजन श्रीवास्तव

लंदन की किसी सड़क पर चलते हुए कभी यह खयाल आता है कि इसी शहर में एक समय मोहनदास करमचंद गांधी भी रहते थे। इतिहास अचानक बहुत अपना सा लगने लगता है। आज जिस गांधी को हम धोती, लाठी और अहिंसा के पर्याय के रूप में याद करते हैं, लंदन ने उन्हें उस रूप में पहली बार नहीं देखा था।

यहाँ आने वाला युवक एक संकोची गुजराती था, जिसकी उम्र अभी उन्नीस वर्ष भी नहीं हुई थी और जिसका सपना था कानून पढ़कर बैरिस्टर बनना।

सितंबर 1888 में मोहनदास पहली बार इंग्लैंड पहुँचे। 29 सितंबर को वे Southampton पहुँचे और 6 नवंबर को Inner Temple में कानून की पढ़ाई के लिए enrolled हुए। Inner Temple लंदन के उन ऐतिहासिक संस्थानों में है, जिनसे बैरिस्टर बनने की परंपरा जुड़ी हुई है। गांधी ने अपना कानूनी प्रशिक्षण पूरा किया और 27 मई 1891 को उन्हें Bar में बुलाया गया।

इसी दौरान उन्होंने University College London में भी कानून के लिए पंजीकरण कराया। UCL के अनुसार उनका वहाँ अध्ययनकाल 1888 से 1889 के बीच था।

लंदन पहुँचकर युवा मोहनदास कुछ समय तक अंग्रेज भद्र पुरुष बनने की कोशिश करते रहे। अच्छे कपड़े पहनना, टोपी लगाना, नृत्य सीखना, वायलिन बजाना और फ्रेंच सीखना उनके शुरुआती लंदन जीवन का हिस्सा था। उनकी उस युवा अवस्था की तस्वीर मन में बनती है तो हमारे नोट पर छपे गांधी से उसका मेल बैठाना मुश्किल लगता है।

पिकाडिली सर्कस के आसपास उन्हें युवा रूप में देखने वालों ने उन्हें सूट-बूट, टोपी और हाथ में छड़ी के साथ देखा होगा। गांधी के अपने संस्मरणों और उनके लंदन प्रवास के विवरणों से भी उनके इस दौर की झलक मिलती है। कौन सोच सकता था कि यही युवक आगे चलकर अंग्रेजी साम्राज्य को सबसे बड़ी नैतिक चुनौती देने वाला व्यक्ति बनेगा।

शाकाहारी भोजन ने उन्हें परेशान किया। उन्होंने अपनी माँ को वचन दिया था कि वे मांस और मदिरा से दूर रहेंगे। लंदन में उनके लिए शाकाहारी भोजन खोजना आसान नहीं था। एक समय उन्हें पर्याप्त भोजन न मिलने के कारण भूखा भी रहना पड़ा। अंततः उन्हें एक शाकाहारी रेस्तराँ मिला और फिर वे London Vegetarian Society से जुड़े। यहाँ भोजन उनके लिए केवल स्वाद या आवश्यकता का विषय नहीं रहा, बल्कि नैतिकता और आत्मसंयम से जुड़ा प्रश्न बन गया।

उन्होंने पढ़ना शुरू किया, बहसें सुनीं, धर्म और दर्शन पर विचार किया और धीरे-धीरे अपने ही संस्कारों को नए ढंग से समझने लगे।

यह शायद गांधी की पहली लंदन यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक पक्ष था। वे पश्चिम को समझने आए थे और इसी कोशिश में उन्होंने भारत को भी नए ढंग से समझना शुरू किया।

1891 में कानून की पढ़ाई पूरी करके वे भारत लौट गए। लेकिन लंदन से उनका रिश्ता समाप्त नहीं हुआ। वे 1906, 1909 और 1914 में फिर ब्रिटेन आए। तब वे वही संकोची कानून विद्यार्थी नहीं थे। दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के अधिकारों के संघर्ष ने उनके व्यक्तित्व को बदल दिया था। अब वे अपने लोगों की आवाज लेकर ब्रिटिश सत्ता के सामने खड़े होने लगे थे। 1906 में वे भारतीय प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में ब्रिटेन आए थे।

1909 की यात्रा विशेष रूप से दिलचस्प है। इस बार गांधी दक्षिण अफ्रीका से ब्रिटेन आए और ब्रिटेन में भारतीयों के प्रश्न को लेकर सक्रिय रहे। लेकिन इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक प्रसंग उनके इंग्लैंड से दक्षिण अफ्रीका लौटते समय सामने आया। नवंबर 1909 में Kildonan Castle जहाज पर उन्होंने हिन्द स्वराज लिखा।

जिस पश्चिमी आधुनिकता को समझने के लिए कभी वे लंदन आए थे, अब उसी आधुनिक सभ्यता की सीमाओं पर वे सवाल उठा रहे थे। उनके भीतर एक नया गांधी जन्म ले रहा था।

1914 में वे फिर इंग्लैंड आए। संयोग देखिए, इसी समय प्रथम विश्वयुद्ध शुरू हो गया। गांधी ने भारतीय स्वयंसेवकों के लिए एक field ambulance unit के गठन में भूमिका निभाई और स्वयं nursing तथा प्राथमिक उपचार का प्रशिक्षण लिया। उस समय तक उनका विश्वास था कि ब्रिटेन के साथ संवाद और सहयोग के रास्ते भारतीयों के अधिकारों की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।

फिर आया 1931।

अब गांधी केवल किसी कानून की पढ़ाई करने वाला भारतीय युवक नहीं थे। वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे प्रमुख नेताओं में से एक थे। वे Second Round Table Conference में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में लंदन आए। इस बार उनके शरीर पर न सूट था, न टाई, न चमकते जूते। साधारण धोती, चादर और हाथ में लाठी थी।

जिस शहर में कभी युवा मोहनदास ने अंग्रेजों जैसा दिखने की कोशिश की थी, उसी शहर में अब गांधी अपनी भारतीय पहचान को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाकर खड़े थे।

रहने के लिए उन्होंने कोई आलीशान होटल नहीं चुना। वे East London के Bow इलाके में स्थित Kingsley Hall में रहे। सामाजिक कार्यकर्ता और शांति समर्थक Muriel Lester ने उन्हें वहाँ रहने का निमंत्रण दिया था। गांधी ने भी स्पष्ट रूप से इच्छा व्यक्त की थी कि वे ऐसे स्थान पर रहना चाहते हैं जहाँ वे पूर्वी लंदन के आम और गरीब लोगों के बीच रह सकें।

गांधी 12 सितंबर से 5 दिसंबर 1931 तक Kingsley Hall से जुड़े रहे। यद्यपि Round Table Conference की बैठकों के निकट होने के कारण 21 सितंबर को उनका कामकाजी कार्यालय 88 Knightsbridge में स्थानांतरित कर दिया गया था, वे हर दिन Kingsley Hall लौटते थे। उनका छोटा सा कमरा ऊपर की मंजिल पर था। सुबह वे आसपास की गलियों में टहलते और स्थानीय लोगों से मिलते। लोग उन्हें देखने आते, बच्चे कौतूहल से उन्हें देखते और पत्रकार उनकी गतिविधियों पर नजर रखते।

एक तरफ लंदन के राजसी कमरों में भारत के संवैधानिक भविष्य पर बातचीत चल रही थी, दूसरी तरफ East End के एक साधारण सामुदायिक केंद्र में धोती पहने गांधी आम लोगों के बीच बैठे मिलते थे।

इसी यात्रा में उनकी मुलाकात चार्ली चैप्लिन से भी हुई। 22 सितंबर 1931 का वह दृश्य कितना अनोखा रहा होगा। एक तरफ दुनिया का महान हास्य कलाकार और दूसरी तरफ दुनिया को अहिंसा का रास्ता दिखाने वाला नेता। दोनों ने आधुनिक सभ्यता और मशीनों के प्रभाव जैसे प्रश्नों पर बातचीत की। गांधी हेरिटेज पोर्टल भी 22 सितंबर 1931 को गांधी और चैप्लिन की मुलाकात की पुष्टि करता है।

गांधी लंकाशायर भी गए। वहाँ कपड़ा उद्योग से जुड़े मजदूरों और textile industry के लोगों से मिले। भारतीय स्वदेशी आंदोलन और ब्रिटिश कपड़ा उद्योग पर उसके प्रभाव के कारण वहाँ बेरोजगारी और असंतोष की स्थितियाँ थीं। फिर भी गांधी ने मजदूरों से खुलकर बात की। वे अपनी बात छिपाते नहीं थे और सामने वाले की पीड़ा सुनने से भी पीछे नहीं हटते थे।

यही उनकी खासियत थी। वे ब्रिटिश शासन के विरोधी थे, ब्रिटिश मनुष्य के नहीं। वे व्यवस्था से असहमति रखते थे, व्यक्ति से दुश्मनी नहीं।

1931 का लंदन केवल Round Table Conference का लंदन नहीं था। गांधी ने यहाँ राजनेताओं से बातचीत की, विद्यार्थियों से संवाद किया, मजदूरों से मिले और आम लोगों के बीच रहे। वे ब्रिटिश सत्ता से भारत की स्वतंत्रता की बात कर रहे थे, लेकिन साथ ही ब्रिटिश समाज के सामान्य लोगों के साथ संवाद का पुल भी बना रहे थे।

गांधी की लंदन यात्राओं में मुझे सबसे अधिक आकर्षित करने वाली बात यही लगती है कि पहली यात्रा और उनकी अंतिम ब्रिटेन यात्रा के बीच 43 वर्ष का अंतर था। इन 43 वर्षों में केवल एक व्यक्ति की उम्र नहीं बढ़ी थी, उसका पूरा व्यक्तित्व और उसकी सोच बदल गई थी।

1888 में मोहनदास लंदन से सीखने आए थे।
1931 में गांधी लंदन को आईना दिखाने आए।

पहली बार वे अंग्रेजी समाज में स्वयं को ढालने की कोशिश कर रहे थे। आखिरी बार वे अपनी भारतीय पहचान के साथ ब्रिटिश साम्राज्य के सामने खड़े थे।

पहली बार उनके हाथ में कानून की किताबें थीं। आखिरी बार हाथ में लाठी थी। लेकिन उस लाठी के पीछे करोड़ों भारतीयों की उम्मीद खड़ी थी। वह केवल सहारे की लाठी नहीं थी, वह अहिंसा और आत्मबल का प्रतीक बन चुकी थी।

यही लंदन और गांधी की कथा का सबसे सुंदर पक्ष है। यह केवल एक महापुरुष की यात्राओं का विवरण नहीं, एक मनुष्य के भीतर हुए वैचारिक परिवर्तन की कहानी है।

एक ऐसा युवक जो कभी लंदन में अंग्रेज gentleman बनने की कोशिश कर रहा था, उसी शहर में चार दशक से कुछ अधिक समय बाद अपनी सादगी, अपनी धोती और अपनी अहिंसा के साथ ब्रिटिश साम्राज्य के प्रतिनिधियों के सामने खड़ा था।

लंदन ने मोहनदास को केवल कानून नहीं सिखाया था। उसने उन्हें प्रश्न करना सिखाया था। और शायद प्रश्नों की वही आदत आगे चलकर उन्हें अपने समय की सबसे बड़ी सत्ता से प्रश्न करने का साहस दे गई।

यह मोहनदास से गांधी बनने की यात्रा थी।

और शायद, इसी अर्थ में, गांधी की लंदन यात्रा केवल लंदन की यात्रा नहीं थी। यह एक मनुष्य के अपने भीतर लौटने की यात्रा थी।

 - विवेक रंजन श्रीवास्तव
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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