लघुकथा :
अश्रु धारा
रमा की आँखों से आँसुओं की धार रुक ही नहीं रही थी। आखिर रुकती भी क्यों? पूरे पंद्रह साल के लंबे इंतज़ार के बाद आज जाके उसकी सूनी गोद भरी थी।
पंद्रह साल पहले जब घर में रमन का जन्म हुआ था, तो लगा था कि दुनिया भर की खुशियाँ रमा की झोली में आ गिरी हैं। पर भगवान को कुछ और ही मंज़ूर था। रमन अभी मुश्किल से दो ही साल का हुआ था कि एक कड़े बुखार ने उसे रमा के आँचल से छीन लिया। नन्हे से कलेजे के टुकड़े को गँवाने के बाद रमा का हँसता-खेलता घर जैसे एकदम सुनसान हो गया।
उस हादसे के बाद दस लंबे बरस बीत गए। रमा ने कौनो मन्नत नहीं छोड़ी, हर देहरी पर माथा टेका। पर जैसे-जैसे दिन ढलते गए, घर-परिवार वाले भी उम्मीद छोड़ चुके थे। सब यही कहने लगे थे कि अब रमा की किस्मत में सूनापन ही लिखा है।
पर कहते हैं न कि ऊपर वाले के घर देर है, अंधेर नहीं। दस साल की लंबी तपस्या के बाद, जब 'माता रानी' की किरपा से उसकी गोद में एक नन्हीं बिटिया का अवतरण हुआ, तो लगा जैसे छाई हुई घनी रात छँट गई हो।
अस्पताल के उस कमरे में जब दाई ने नन्हीं बिटिया को रमा की गोद में लिटाया, तो रमा का कलेजा भर आया। उसकी आँखों से आँसू यूँ ढलकने लगे मानो आँख के पानी से वह साक्षात देवी माई के छोटे-छोटे पाँव पखार रही हो।
रमा ने काँपते हाथों से अपनी नन्हीं बिटिया के दोनों कोमल-कोमल पैरों को उठाया और बड़े भाव से अपने माथे से लगा लिया। रुँधे गले से सिसकते हुए उसने कहा—
"अरे माई... तू सच में आ गई मोरे घर!"
रमा की आँखों से बहती वह अश्रु धारा केवल रोना नहीं थी, वह तो दस बरसों से छाती में दबाए उस गहरे दर्द का निकास थी, जिसने आज एक माँ को फिर से जी उठा दिया था।
- अभिलाषा श्रीवास्तव गोरखपुर
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कथा कहानी
