ad

लघु कथा : रुका हुआ समय — विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल



लघु कथा : 

रुका हुआ समय 

 — विवेक रंजन श्रीवास्तव

लघुकथा लिखते-लिखते मेरी आँख लग गई थी। सामने मेज पर घड़ी रखी थी और लैपटॉप  पर कहानी अधूरी थी।
 कहानी में समय बदलने को लेकर मैं उलझा हुआ था। लघुकथा के शिल्प का एक नियम था कि घटनाओं का समय सीमित रहे, अनावश्यक विस्तार न हो। इसी उधेड़बुन में कब झपकी आ गई, पता ही नहीं चला।

मैंने सपना देखा कि रात के ठीक बारह बजे  समय अचानक ठहर गया है।

घड़ियों की सुइयाँ बारह पर ठंड से जम गईं हैं। तारीख बदलने से इनकार कर रही है। डिजिटल कैलेंडर अटक गए। शेयर बाजार के अंक स्थिर हो गए। दुनिया चल रही थी, लेकिन समय नहीं चल रहा था।
सरकार ने आपात बैठक बुलाई।

प्रधानमंत्री ने पूछा, “समय क्यों रुका?”
विज्ञान मंत्री ने कहा, “प्रारंभिक जाँच में तकनीकी गड़बड़ी की आशंका है।”
गृह मंत्री ने गंभीरता से जोड़ा, “विदेशी साजिश भी हो सकती है। हमारे कार्यकाल में समय का रुकना सामान्य घटना नहीं है।”

विपक्ष ने इसे लोकतंत्र पर हमला बताया। आरोप लगाया कि सरकार समय को अपने  हिसाब से चलाना चाहती है।
 टीवी चैनलों पर बहस छिड़ गई।
 एक एंकर चीख रहा था, “समय किसने रोका? किसके इशारे पर रोका?
 क्या समय भी  सरकार के दबाव में है? हमारे साथ बने रहिए, हम आपको समय के रुकने से पहले की खबर भी दिखाएँगे!”

स्थिति की गंभीरता देखते हुए सरकार ने  एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक जाँच आयोग गठित किया। 

न्यायाधीश महोदय ने पदभार सँभालते ही पूछा, “समय किस तारीख और किस समय रुका था?”
अधिकारी ने कहा, “रात बारह बजे, मान्यवर।”
“अच्छा! तो घटना के बाद कितना समय बीत चुका है?”
अधिकारी चुप हो गया। समय रुका था, इसलिए बीते हुए समय की गणना भी विवादास्पद थी।

न्यायाधीश ने आदेश दिया, “पहले निर्धारित किया जाए कि समय रुका है या समय के रुकने का भ्रम है। उसके बाद यह पता लगाया जाए कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है।”

आयोग की पहली बैठक में ही तय हुआ कि मामले की जाँच के लिए विशेषज्ञ समिति बनाई जाएगी। विशेषज्ञों की नियुक्ति के लिए उपसमिति बनी। उपसमिति ने अपनी पहली बैठक में कार्यक्षेत्र निर्धारित करने के लिए एक प्रारूप तैयार करने का निर्णय लिया। प्रारूप पर विचार अगली बैठक में होना था।

समय अब भी रुका हुआ था।
तीसरे दिन आयोग की अंतरिम रिपोर्ट आई। उसमें कहा गया कि समय का रुकना अत्यंत गंभीर मामला है। इसकी पुनरावृत्ति रोकने के लिए एक स्थायी प्राधिकरण गठित किया जाना चाहिए, जो समय की निगरानी करे और आवश्यकता पड़ने पर उसे गतिमान बनाए रखने के उपाय सुझाए।

इसी बीच, शहर के एक पुराने बाजार में बैठे घड़ीसाज ने अपनी दुकान की बंद घड़ी खोली। उसने भीतर जमा धूल साफ की, एक छोटा पुर्जा ठीक किया और चाबी भर दी।

घड़ी चल पड़ी।

टिक... टिक... टिक...
खबर आग की तरह फैली , लोगों की भीड़ जुट गई। खबर अधिकारियों तक भी पहुँची। घड़ी साज को राष्ट्रीय सम्मान के लिए नामांकित करने की घोषणा की गई। 
प्रधानमंत्री ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए घोषणा की, “सरकार के निर्णायक नेतृत्व, वैज्ञानिक दृष्टिकोण,एक सौ चालीस करोड़ नागरिकों  के सहयोग और संस्थागत प्रयासों से समय पुनः गतिमान हुआ है। यह हमारी ऐतिहासिक उपलब्धि है।”

जाँच आयोग की अंतिम रिपोर्ट में भी यही निष्कर्ष निकला। सेवानिवृत्त न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि समय के रुकने के पीछे किसी व्यक्ति की प्रत्यक्ष भूमिका प्रमाणित नहीं हुई है।

मैं सपने में इस निष्कर्ष पर पहुँचा ही था कि
श्रीमती जी ने चाय के लिए आवाज दी।
मेरी झपकी टूट गई।
कंप्यूटर पर वही अधूरी लघुकथा थी , मैं सोच रहा था 
“समय पर काम करना नागरिक का कर्तव्य है, लेकिन समय रोककर रखना व्यवस्था का विशेषाधिकार।”

मैं इस वाक्य का व्यंग्यार्थ समझने की कोशिश कर रहा था ।
 मुझे अपनी उलझन याद आई, लघुकथा में समय बदलने के नियम को लेकर मैं सोने से पहले सोच रहा था। सपने में समय ही रुक गया था, आयोग बैठ गया था और सेवानिवृत्त न्यायाधीश फैसला भी सुना चुके थे।

मैं मुस्कराया। कहानी का कथ्य मिल गया था, अंत भी मिल गया था।
पर वही समस्या बाकी थी।लघुकथा में समय बदलने का नियम टूट सकता है या नहीं ?

-विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

Post a Comment

Previous Post Next Post