काव्य :
पगडंडी और सड़क
पगडंडी को सड़क
बनते देखा है,
सड़क को पगडंडी भी
बनते देखा है।
जिस दिन कोई महान
गुजरा था
पगडंडी
सड़क बन गई थी।
लेकिन,
उसके गुजर जाने के बाद
दिन पर दिन
सड़क सिमटती गई
और
फिर पगडंडी बन गई।
जब आमजन
पग पग चलते हैं
तब बनती है पगडंडी
और सड़क
बड़े लोगों के
चलने से बनती है।
फिर,
प्रगति की निशानी
बन जाती है।
- डॉ सत्येंद्र सिंह
पुणे महाराष्ट्र
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सत्येंद्र सिंह जी,
ReplyDeleteबहुत मार्मिक रचना। पगडंडी और सड़क वर्तमान की सच्चाई है। हार्दिक बधाई🎉🎊
लतिका